Быт. Исх. Лев. Чис. Втор. Нав. Суд. Руф. 1Цар. 2Цар. 3Цар. 4Цар. 1Пар. 2Пар. 1Ездр. Неем. 2Ездр. Тов. Иудиф. Эсф. 1Мак. 2Мак. 3Мак. 3Ездр. Иов. Пс. Притч. Еккл. Песн. Прем. Сир. Ис. Иер. Плч. Посл.Иер. Вар. Иез. Дан. Ос. Иоил. Ам. Авд. Ион. Мих. Наум. Авв. Соф. Агг. Зах. Мал. Мф. Мк. Лк. Ин. Деян. Иак. 1Пет. 2Пет. 1Ин. 2Ин. 3Ин. Иуд. Рим. 1Кор. 2Кор. Гал. Еф. Флп. Кол. 1Фес. 2Фес. 1Тим. 2Тим. Тит. Флм. Евр. Откр.

Псалтирь

 
  • Псало́мъ Аса́фу.
  • Бо́же, прiидо́ша язы́цы въ достоя́нiе твое́, оскверни́ша хра́мъ святы́й тво́й,
  • положи́ша Иерусали́мъ я́ко ово́щное храни́лище: положи́ша тру́пiя ра́бъ тво­и́хъ бра́шно пти́цамъ небе́снымъ, пло́ти преподо́бныхъ тво­и́хъ звѣре́мъ земны́мъ:
  • пролiя́ша кро́вь и́хъ я́ко во́ду о́крестъ Иерусали́ма, и не бѣ́ погреба́яй.
  • Бы́хомъ поноше́нiе сосѣ́домъ на́шымъ, подражне́нiе и поруга́нiе су́щымъ о́крестъ на́съ.
  • Доко́лѣ, Го́споди, прогнѣ́ваешися до конца́? разжже́т­ся я́ко о́гнь рве́нiе твое́?
  • Пролі́й гнѣ́въ тво́й на язы́ки незна́ющыя тебе́, и на ца́р­ст­вiя, я́же и́мене тво­его́ не при­­зва́ша:
  • я́ко поядо́ша Иа́кова, и мѣ́сто его́ опустоши́ша.
  • Не помяни́ на́шихъ беззако́нiй пе́рвыхъ: ско́ро да предваря́тъ ны́ щедро́ты твоя́, Го́споди, я́ко обнища́хомъ зѣло́.
  • Помози́ на́мъ, Бо́же, спаси́телю на́шъ, сла́вы ра́ди и́мене тво­его́: Го́споди, изба́ви ны́ и очи́сти грѣхи́ на́шя и́мене ра́ди тво­его́.
  • Да не когда́ реку́тъ язы́цы: гдѣ́ е́сть Бо́гъ и́хъ? и да увѣ́ст­ся во язы́цѣхъ предъ очи́ма на́шима от­мще́нiе кро́ве ра́бъ тво­и́хъ пролиты́я.
  • Да вни́детъ предъ тя́ воз­дыха́нiе окова́н­ныхъ: по вели́чiю мы́шцы тво­ея́ снабди́ сы́ны умерщвле́н­ныхъ.
  • Возда́ждь сосѣ́домъ на́шымъ седмери́цею въ нѣ́дро и́хъ поноше́нiе и́хъ, и́мже поноси́ша тя́, Го́споди.
  • Мы́ же лю́дiе тво­и́ и о́вцы па́жити тво­ея́ исповѣ́мыся тебѣ́, Бо́же, во вѣ́къ, въ ро́дъ и ро́дъ воз­вѣсти́мъ хвалу́ твою́.
  • Боже! язычники пришли в наследие Твое, осквернили святый храм Твой, Иерусалим превратили в развалины;
  • трупы рабов Твоих отдали на съедение птицам небесным, тела святых Твоих – зверям земным;
  • пролили кровь их, как воду, вокруг Иерусалима, и некому было похоронить их.
  • Мы сделались посмешищем у соседей наших, поруганием и посрамлением у окружающих нас.
  • Доколе, Господи, будешь гневаться непрестанно, будет пылать ревность Твоя, как огонь?
  • Пролей гнев Твой на народы, которые не знают Тебя, и на царства, которые имени Твоего не призывают,
  • ибо они пожрали Иакова и жилище его опустошили.
  • Не помяни нам грехов наших предков; скоро да предварят нас щедроты Твои, ибо мы весьма истощены.
  • Помоги нам, Боже, Спаситель наш, ради славы имени Твоего; избавь нас и прости нам грехи наши ради имени Твоего.
  • Для чего язычникам говорить: «где Бог их?» Да сделается известным между язычниками пред глазами нашими отмщение за пролитую кровь рабов Твоих.
  • Да придет пред лице Твое стенание узника; могуществом мышцы Твоей сохрани обреченных на смерть.
  • Семикратно возврати соседям нашим в недро их поношение, которым они Тебя, Господи, поносили.
  • А мы, народ Твой и Твоей пажити овцы, вечно будем славить Тебя и в род и род возвещать хвалу Тебе.
  • قصيدة لآساف. اصغ يا شعبي الى شريعتي. اميلوا آذانكم الى كلام فمي.

  • افتح بمثل فمي. اذيع الغازا منذ القدم.

  • التي سمعناها وعرفناها وآباؤنا اخبرونا.

  • لا نخفي عن بنيهم الى الجيل الآخر مخبرين بتسابيح الرب وقوته وعجائبه التي صنع.

  • اقام شهادة في يعقوب ووضع شريعة في اسرائيل التي اوصى آباءنا ان يعرّفوا بها ابناءهم

  • لكي يعلم الجيل الآخر. بنون يولدون فيقومون ويخبرون ابناءهم

  • فيجعلون على الله اعتمادهم ولا ينسون اعمال الله بل يحفظون وصاياه

  • ولا يكونون مثل آبائهم جيلا زائغا وماردا جيلا لم يثبت قلبه ولم تكن روحه امينة لله

  • بنو افرايم النازعون في القوس الرامون انقلبوا في يوم الحرب.

  • لم يحفظوا عهد الله وابوا السلوك في شريعته

  • ونسوا افعاله وعجائبه التي اراهم.

  • قدام آبائهم صنع اعجوبة في ارض مصر بلاد صوعن.

  • شق البحر فعبّرهم ونصب المياه كندّ.

  • وهداهم بالسحاب نهارا والليل كله بنور نار.

  • شق صخورا في البرية وسقاهم كانه من لجج عظيمة.

  • اخرج مجاري من صخرة واجرى مياها كالانهار.

  • ثم عادوا ايضا ليخطئوا اليه لعصيان العلي في الارض الناشفة.

  • وجربوا الله في قلوبهم بسؤالهم طعاما لشهوتهم.

  • فوقعوا في الله. قالوا هل يقدر الله ان يرتب مائدة في البرية.

  • هوذا ضرب الصخرة فجرت المياه وفاضت الاودية. هل يقدر ايضا ان يعطي خبزا ويهيئ لحما لشعبه.

  • لذلك سمع الرب فغضب واشتعلت نار في يعقوب وسخط ايضا صعد على اسرائيل.

  • لانهم لم يؤمنوا بالله ولم يتكلوا على خلاصه.

  • فامر السحاب من فوق وفتح مصاريع السموات

  • وامطر عليهم منّا للأكل وبر السماء اعطاهم.

  • اكل الانسان خبز الملائكة. ارسل عليهم زادا للشبع.

  • اهاج شرقية في السماء وساق بقوته جنوبية

  • وامطر عليهم لحما مثل التراب وكرمل البحر طيورا ذوات اجنحة.

  • واسقطها في وسط محلتهم حوالي مساكنهم.

  • فأكلوا وشبعوا جدا واتاهم بشهوتهم.

  • لم يزوغوا عن شهوتهم طعامهم بعد في افواههم

  • فصعد عليهم غضب الله وقتل من اسمنهم. وصرع مختاري اسرائيل.

  • في هذا كله اخطأوا بعد ولم يؤمنوا بعجائبه

  • فافنى ايامهم بالباطل وسنيهم بالرعب.

  • اذ قتلهم طلبوه ورجعوا وبكروا الى الله

  • وذكروا ان الله صخرتهم والله العلي وليّهم.

  • فخادعوه بافواههم وكذبوا عليه بالسنتهم.

  • اما قلوبهم فلم تثبت معه ولم يكونوا امناء في عهده

  • اما هو فرؤوف يغفر الاثم ولا يهلك وكثيرا ما رد غضبه ولم يشعل كل سخطه.

  • ذكر انهم بشر ريح تذهب ولا تعود.

  • كم عصوه في البرية واحزنوه في القفر.

  • رجعوا وجربوا الله وعنّوا قدوس اسرائيل.

  • لم يذكروا يده يوم فداهم من العدو

  • حيث جعل في مصر آياته وعجائبه في بلاد صوعن

  • اذ حول خلجانهم الى دم ومجاريهم لكي لا يشربوا.

  • ارسل عليهم بعوضا فاكلهم وضفادع فافسدتهم.

  • اسلم للجردم غلتهم وتعبهم للجراد.

  • اهلك بالبرد كرومهم وجميزهم بالصقيع.

  • ودفع الى البرد بهائمهم ومواشيهم للبروق.

  • ارسل عليهم حمو غضبه سخطا ورجزا وضيقا جيش ملائكة اشرار‏.

  • مهد سبيلا لغضبه. لم يمنع من الموت انفسهم بل دفع حياتهم للوبإ

  • وضرب كل بكر في مصر. اوائل القدرة في خيام حام.

  • وساق مثل الغنم شعبه وقادهم مثل قطيع في البرية.

  • وهداهم آمنين فلم يجزعوا. اما اعداؤهم فغمرهم البحر.

  • وادخلهم في تخوم قدسه هذا الجبل الذي اقتنته يمينه.

  • وطرد الامم من قدامهم وقسمهم بالحبل ميراثا واسكن في خيامهم اسباط اسرائيل

  • فجربوا وعصوا الله العلي وشهاداته لم يحفظوا

  • بل ارتدّوا وغدروا مثل آبائهم. انحرفوا كقوس مخطئة.

  • اغاظوه بمرتفعاتهم واغاروه بتماثيلهم.

  • سمع الله فغضب ورذل اسرائيل جدا

  • ورفض مسكن شيلو الخيمة التي نصبها بين الناس.

  • وسلم للسبي عزه وجلاله ليد العدو.

  • ودفع الى السيف شعبه وغضب على ميراثه.

  • مختاروه اكلتهم النار وعذاراه لم يحمدن.

  • كهنته سقطوا بالسيف وارامله لم يبكين

  • فاستيقظ الرب كنائم كجبار معّيط من الخمر.

  • فضرب اعداءه الى الوراء. جعلهم عارا ابديا.

  • ورفض خيمة يوسف ولم يختر سبط افرايم.

  • بل اختار سبط يهوذا جبل صهيون الذي احبه.

  • وبنى مثل مرتفعات مقدسه كالارض التي اسسها الى الابد.

  • واختار داود عبده واخذه من حظائر الغنم.

  • من خلف المرضعات أتى به ليرعى يعقوب شعبه واسرائيل ميراثه.

  • فرعاهم حسب كمال قلبه وبمهارة يديه هداهم

  • Ein Gedicht Asafs.

    Mein Volk, höre auf meine Weisung!
    Ihr alle, gebt Acht auf meine Worte!

  • Ich will euch an frühere Zeiten erinnern,
    euch Gottes geheimnisvolle Führungen zeigen.
  • Wir kennen das alles seit langen Jahren,
    weil wir immer wieder davon hörten,
    wenn unsere Väter es uns erzählten.
  • Wir wollen es unseren Kindern nicht verschweigen.
    Auch die kommende Generation soll hören
    von der Macht des HERRN,
    von seinen Wundern,
    von allen Taten, für die wir ihn preisen.
  • Er hat mit Israel einen Bund geschlossen,
    den Nachkommen Jakobs seine Weisungen gegeben.
    Er hat unseren Vorfahren befohlen,
    ihren Kindern davon zu erzählen,
  • damit auch die folgende Generation es erfährt,
    die Kinder, die noch geboren werden.
    Und wenn sie selbst Eltern geworden sind,
    sollen sie es weitergeben an ihre Kinder.
  • Sie sollen auf Gott vertrauen,
    seine Taten nie vergessen
    und seine Gebote treu befolgen.
  • Sie sollen nicht ihren Vorfahren gleichen,
    der Generation von widerspenstigen Rebellen,
    unzuverlässig und unbeständig,
    untreu gegenüber Gott.
  • – Die Männer von Efraïm,
    mit Pfeilen und Bogen gerüstet,
    ergriffen am Tag des Kampfes die Flucht. –
  • Sie hielten sich nicht an den Bund mit Gott
    und weigerten sich,
    seiner Weisung zu gehorchen.
  • Sie vergaßen die machtvollen Wunder,
    die er vor ihren Augen getan hatte.
  • In Ägypten, in der Gegend von Zoan,
    vor den Augen ihrer Väter,
    vollbrachte Gott gewaltige Taten:
  • Er zerteilte das Meer
    und ließ sie hindurchziehen;
    er türmte das Wasser auf wie einen Damm.
  • Tagsüber leitete er sie mit einer Wolke
    und in der Nacht mit hellem Feuerschein.
  • In der Wüste spaltete er Felsen
    und ließ sie Wasser aus der Tiefe trinken.
  • Aus hartem Gestein brachen Bäche hervor
    und stürzten mit mächtigem Schwall herab.
  • Sie aber sündigten weiter gegen den Höchsten,
    sie widersetzten sich ihm dort im dürren Land.
  • Sie wagten es, Gott auf die Probe zu stellen,
    als sie Nahrung verlangten nach ihrem Geschmack.
  • Sie zweifelten an ihm und sagten:
    »Bringt Gott es etwa fertig,
    uns hier in der Wüste den Tisch zu decken?
  • Es ist wahr, er hat den Felsen geschlagen
    und das Wasser strömte in Bächen heraus.
    Aber kann er uns auch Brot besorgen?
    Kann er Fleisch herbeibringen für sein Volk?«
  • Als der HERR sie so reden hörte,
    wurde er zornig auf die Nachkommen Jakobs,
    sein Zorn traf Israel wie ein Feuer.
  • Sie hatten ihrem Gott nicht vertraut
    und nicht mit seiner Hilfe gerechnet.
  • Trotzdem gab er den Wolken Befehl
    und öffnete die Himmelstore:
  • Er ließ das Manna auf sie regnen,
    er gab ihnen das Korn des Himmels zu essen.
  • Sie alle aßen das Brot der Engel;
    Gott schickte ihnen Nahrung
    und machte sie satt.
  • Am Himmel setzte er den Ostwind frei,
    er zwang den Südwind heranzustürmen.
  • Dann ließ er Fleisch auf sie regnen wie Staub,
    Vögel, so zahlreich wie Sand am Meer.
  • Mitten ins Lager ließ er sie fallen,
    rings um die Zelte der Israeliten.
  • Sie aßen und wurden mehr als satt;
    Gott gab ihnen, was sie gefordert hatten,
  • doch ihre Gier war noch nicht gestillt.
    Sie hatten das Fleisch noch zwischen den Zähnen,
  • da wurde Gott zornig auf sie und schlug zu,
    ihre jungen, starken Männer tötete er.
  • Aber trotz allem sündigten sie weiter,
    sie schenkten seinen Wundern kein Vertrauen.
  • Da nahm er ihrem Leben Sinn und Ziel
    und ließ sie vergehen in Angst und Schrecken.
  • Immer wenn Gott einige tötete,
    begannen die anderen, nach ihm zu fragen,
    sie wandten sich ihm zu und suchten ihn.
  • Sie erinnerten sich:
    Gott war doch ihr Beschützer,
    er, der Höchste, war ihr Befreier.
  • Aber alles war Heuchelei;
    was ihr Mund ihm sagte, war gelogen.
  • Ihr Herz hielt nicht entschieden zu ihm,
    sie standen nicht treu zu seinem Bund.
  • Trotzdem blieb er voll Erbarmen:
    Er tilgte sie nicht aus,
    sondern tilgte ihre Schuld.
    Oft genug verschonte er sie
    und hielt seinen Zorn im Zaum.
  • Er wusste ja, sie waren Geschöpfe,
    vergänglich wie ein Windhauch,
    der verweht und niemals wiederkehrt.
  • Wie oft widersetzten sie sich ihm in der Wüste
    und forderten seinen Zorn heraus!
  • Immer wieder stellten sie ihn auf die Probe
    und kränkten ihn, den heiligen Gott Israels.
  • Sie vergaßen seine großen Taten
    und den Tag der Befreiung von ihren Feinden.
  • Damals gab er den Ägyptern Beweise seiner Macht,
    in der Gegend von Zoan vollbrachte er Wunder.
  • Er verwandelte die Ströme und Bäche in Blut,
    sodass niemand mehr daraus trinken konnte.
  • Er schickte den Feinden Ungeziefer, das sie quälte,
    und Frösche, die ihr Land verseuchten.
  • Ihre Ernte lieferte er den Heuschrecken aus,
    die fraßen den Ertrag ihrer Arbeit.
  • Er zerschlug ihre Reben durch Hagel,
    ihre Feigen durch riesige Hagelkörner.
  • Auch ihr Vieh gab er dem Hagel preis
    und ihre Herden den Blitzen.
  • Er ließ seinen glühenden Zorn auf sie los,
    rasende Wut und furchtbare Plagen,
    ein ganzes Heer von Unglücksengeln.
  • Er ließ seinem Zorn freien Lauf;
    er bewahrte sie nicht länger vor dem Tod,
    sondern lieferte sie aus an die Pest.
  • Er tötete jeden erstgeborenen Sohn
    in den Häusern der Ägypter,
    der Nachkommen Hams.
  • Dann führte er sein Volk hinaus
    wie eine Herde von Schafen
    und leitete sie auf dem Weg durch die Wüste.
  • Er führte sie sicher,
    sie hatten nichts zu fürchten,
    aber ihre Feinde bedeckte das Meer.
  • Er brachte sie in sein heiliges Land,
    zu dem Berg, den er selbst erobert hatte.
  • Vor ihnen her vertrieb er die Völker;
    das Land verloste er unter die Seinen
    und gab es ihnen als Erbbesitz.
    In den Häusern der Kanaaniter
    ließ er die Stämme Israels wohnen.
  • Sie aber forderten den Höchsten heraus,
    sie richteten sich nicht nach Gottes Geboten.
  • Sie kehrten sich ab und verrieten ihn
    genauso wie früher ihre Väter,
    unzuverlässig wie ein Bogen,
    dessen Sehne reißt.
  • Sie ärgerten ihn mit ihren Opferstätten
    und reizten ihn mit Götzenbildern.
  • Gott sah das alles und wurde zornig,
    er ließ die Israeliten im Stich.
  • Das Zelt, das er bei ihnen aufgeschlagen hatte,
    seine Wohnung in Schilo, gab er auf.
  • Den Feinden erlaubte er,
    die Bundeslade zu entführen,
    das Zeichen seiner Macht und Hoheit.
  • Er war so zornig auf sein eigenes Volk,
    dass er es dem Schwert der Feinde preisgab.
  • Das Feuer fraß die jungen Männer,
    den Mädchen sang niemand mehr das Hochzeitslied.
  • Die Priester wurden mit dem Schwert getötet
    und die Witwen konnten keine Totenklage halten.
  • Da wachte der Herr auf,
    geradeso als hätte er geschlafen,
    wie ein Krieger, der seinen Rausch abschüttelt.
  • Er schlug seine Feinde in die Flucht,
    bedeckte sie mit unauslöschlicher Schande.
  • Die Nachkommen Josefs verwarf er,
    den Stamm Efraïm lehnte er als Führer ab.
  • Doch den Stamm Juda erwählte er
    und den Berg Zion, den er liebte.
  • Dort hat er seinen Tempel gebaut,
    hoch wie der Himmel und fest wie die Erde,
    die er gegründet hat für alle Zeiten.
  • Er erwählte David als seinen Vertrauten.
    Er holte ihn von den Weideplätzen,
  • vom Hüten der Herde rief er ihn weg
    und machte ihn zum König Israels,
    zum Hirten über Gottes eigenes Volk.
  • Und David sorgte für sie mit redlichem Herzen,
    er leitete sie mit kluger Hand.